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आखिर आत्महत्या का ख्याल आने की क्या है वजह ?

साल 2020 में आत्महत्या के कई केस निकल कर सामने आए। बता दें 10 सितंबर को पूरी दुनिया में विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाया जाता है. इस दिवस को मनाने के पीछे लोगों को आत्महत्या के प्रति जागरूक करना है ताकि लोग ऐसे कदम ना उठाएं. जिस तरह हमारे आसपास आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं, इसके प्रति जागरूकता और जरूरी बनती जा रही है. आइए जानते हैं कि कि आखिर किसी व्यक्ति के मन में सुसाइड करने का ख्याल क्यों आता है और इसे कैसे दूर किया जा सकता है. 

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क्यों आता है आत्महत्या का ख्याल- 
सुसाइड अपने आप में कोई मानसिक बीमारी नहीं है. इसके पीछे डिप्रेशन, बाइपोलर डिसऑर्डर, पर्सनालिटी डिसऑर्डर, अचानक किसी घटना का मानसिक असर और तनाव जैसी कई वजहें हैं. इस समस्या से जूझने वाले लोग अक्सर उदास रहते हैं और उसके मन में हर समय नकारात्मक ख्याल आते रहते हैं. कई बार ये अपने आप को परिस्थितियों के सामने इतना असहाय महसूस करते हैं कि उनके मन में आत्महत्या का ख्याल आने लगता है.

ये संकेत देते हैं चेतावनी- 
सुसाइड जैसा बड़ा कदम कोई भी व्यक्ति अचानक नहीं उठाता है. इससे पहले वो जिन चीजों से गुजरता है उसे एक संकेत माना जा सकता है. जरूरत से ज्यादा और बात-बात पर गुस्सा होना, हमेशा उदास रहना, मूड स्विंग होना, भविष्य को लेकर आशंकित रहना, नींद ना आना ये सारे लक्षण बताते हैं कि व्यक्ति किसी तरह के मानसिक उतार-चढ़ाव से गुजर रहा है

गंभीर तनाव और डिप्रेशन के बीच अचानक बिल्कुल शांत हो जाना भी इस बात का संकेत देता है कि समस्या से जूझने वाला व्यक्ति किसी निर्णय पर पहुंच चुका है. ऐसे लोग अकेले रहना पसंद करते हैं और किसी भी तरह सामाजिक गतिविधियों से बचते हैं. किसी भी काम में इनकी दिलचस्पी खत्म होने लगती है. आत्महत्या के बारे में सोचने वाले व्यक्ति के व्यवहार में अचानक बदलाव आने लगते हैं.

कुछ मामलों मे आत्महत्या पर विचार करने वाला व्यक्ति इसके लिए पूरी तैयारी भी कर लेता है. जैसे परिवार और दोस्तों को बिजनेस में शामिल करना, वसीयत तैयार करना या सुसाइड नोट लिखना, बंदूक या ज़हर जैसी चीजें ढूंढना. सबसे ध्यान देना वाली बात ये है कि आत्महत्या के बारे में सोचने वाले 50 से 75 फीसदी लोग इसका जिक्र अपने दोस्त या किसी रिश्तेदार से करते हैं. 

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आत्महत्या का विचार आने पर क्या करें- 
ज्यादातर लोग किसी भी मानसिक समस्या को बीमारी नहीं मानते हैं और डॉक्टर से संपर्क करने से बचते हैं. यही वजह है कि डिप्रेशन की समस्या बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में तेजी से फैल रही है. जब मन में लगातार नकारात्मक और खुद को चोट पहुंचाने जैसे ख्याल आ रहे हों तो डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना चाहिए. इसके अलावा अपने करीबी दोस्त या परिवार के सदस्यों से अपनी दिक्कतों के बारे में बात करनी चाहिए.

डिप्रेशन के शिकार व्यक्ति को अकेले नहीं रहना चाहिए. अपने दोस्तों और परिवार के लगातार संपर्क में रहें, अपनी समस्याओं पर चर्चा करें और खुलकर उनसे मदद मांगे. अकेलेपन से बचने के लिए, किताबें पढ़ें, योग करें, अच्छी नींद लें, शराब और ड्रग्स के सेवन से बचें. अगर आप किसी ऐसी मानसिक समस्या से जूझ रहे हैं जिसके बारे में आप किसी से बात नहीं कर सकते तो, टॉक थेरेपी का सहारा लें और किसी मनोचिकित्सक से संपर्क करें. 

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