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भाजपा में राम, सपा-बसपा के परशुराम 

उत्तरप्रदेश में 2 साल बाद विधानसभा चुनाव आने वाले है, लिहाजा जाति और समीकरण संभालने के लिए गोलबंदी शुरू हो चुकी है इस बार का सियासी संग्राम में BSP और समाजवादी पार्टी ने परशुराम भगवान को राजनीति के केंद्र में उतार दिया है, अब दोनों ही पार्टियां परशुराम के सहारे अपनी सियासी नैया पार लगाना चाहती है, पहले उत्तरप्रदेश के पूर्व मुखयमंत्री अखिलेश यादव ने ऐलान किया था कि समाजवादी पार्टी की सरकार बनेगी तो हर जिले में भगवान परशुराम की मूर्तियां लगाई जाएगी,अब बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने भी यह ऐलान किया है कि अगर 2022 में उन्हें सत्ता मिली तो परशुराम की मूर्ति भी बनवा देंगे और अस्पताल और पार्कों का नाम भी उनके नाम पर रखा जाएगा।

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अगर एसपी और बीएसपी को एक  मौका मिल जाए तो सत्ता में बड़ा  बदलाव कर सकते हैं लिहाजा बुआ ने भतीजे पर भी प्रहार करने  मैं देर नहीं लगाई  उधर बीजेपी ने  बीएसपी और सपा पर निशाना साधते हुए कहा कि जय श्री राम का विरोध करने वाले अब परशुरामके नाम पर सत्ता हासिल करने का ख्वाब देख रहे हैं, मोस्ट वांटेड विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद सोशल मीडिया पर योगी सरकार के खिलाफ ब्राम्हण समाज का गुस्सा देखने को मिला था लेकिन 2 साल बाद  सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला चलेगा या फिर विकास और राष्ट्रवाद  का, यह देखने वाली बात होगी।

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सपा-बसपा की सरकार बनने में रही अहम भूमिका 

महज 10 से 12 फीसद होने के बावजूद यूपी में ब्राह्मण मत इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि चुनाव में ये ओपिनियन मेकर की भूमिका निभाते हैं। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में राजनीतिक विज्ञान विभाग के सेवानिवृत्त प्रो. एसके चतुर्वेदी कहते हैं कि वर्ष 2007 में बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार में इनकी भूमिका को सब देख चुके हैं। वर्ष 2012 में समाजवादी सरकार बनाने में अपर कास्ट विशेषकर ब्राह्मणों के समर्थन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।  

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