news-details
analysis

हिमाचली कंगना बनाम बंगालन रिया(बिकाऊ मीडिया)

क्या भारत में अब सिर्फ दो ही मुद्दे बचे है जैसे सुशांत सिंह राजपूत की मौत और कंगना रानौत का बॉलीवुड माफियाओं के खिलाफ बगावत?
आज देश की मीडिया को देख कर ऐसा ही लगता है कि अब कोरोना का मुद्दा खत्म और नया मुद्दा सुशांत सिंह राजपूत की मौत और कंगना और उद्धव ठाकरे के बीच की लड़ाई ही इस देश की मुख्य समस्या हो गयी है| आज अगर देश की मीडिया की बात करे तो कुछ चैनल्स को छोड़ कर बाकि चैनल्स को देख कर सिर्फ ऐसा ही लगता है जैसे भारत ने कोरोना की समस्या से पूरी तरह निजात पा ली है और अब और कोई मुद्दा इस देश में बाकि ही नही रह गया है| सरकार भी इन मुद्दों के बारे में बात करने को तैयार नही है| क्या मीडिया बिकाऊ है? जिनको इस बात की फंडिंग की जा रही हो कि आप देश वासियों का ध्यान इस समस्या से हटा दीजिये कि कोरोना महामारी ने देश की अर्थव्यवस्था और आम आदमी पर किस तरह से प्रभाव डाला है और कैसे आम आदमी अपने रोजगार और रोजी रोटी के लिए रो रहा है| क्या ये सब समस्याएँ देश में खत्म हो चुकी है? जो देश का मीडिया दिखाना नही चाहता या फिर देश के लोगो को इस बात से फर्क नही पड़ता किस तरह से आम आदमी इस महामारी की वजह से परेशान है|

और पढ़े:  इस देश की इकोनॉमी क्या चंद हथेलियों को भरने के लिए ही जिंदा है ?

सुशांत सिंह राजपूत की मौत से मै भी दुखी हूँ| मै मानती हूँ कि उसकी मौत आत्महत्या थी या हत्या इसकी जांच होनी चाहिए| पर क्या अब देश में एक यही मुद्दा रह गया है कि उसके कातिलो को सजा मिली या नहीं| देश की मीडिया क्या यह भूल गयी है कि कोरोना महामारी के बाद देश में बेरोजगारी कितनी बड़ी है और कितने लोगो का रोजगार इस महामारी की वजह से गया है| पिछले 3 महीनो की बात करे तो मीडिया के अनुसार देश केवल इन्ही चीजो में उलझा है कि सुशांत को उसकी प्रेमिका रिया ने कैसे मारा या मरवाया? या फिर कैसे कंगना ने ये कहा कि बॉलीवुड में सिर्फ परिवारवाद चलता है| इन मीडिया वालो का बस चले तो आज ही रिया को फांसी दे दे और आज ही कंगना इस बात का पर्दाफाश कर देंगी कि बॉलीवुड में किस तरह परिवारवाद चलता है|  
अरे कोई इन मीडिया वालो को बताओ कि इस बारे में भी बात करे कि देश का युवा किस तरह से बेरोजगार घूम रहा है और कैसे रोजगार के लिए दर दर भटक रहा है| गरीब आदमी जो रोज का कमाने खाने वाला है उसका 6 महीने से काम धंधा बंद चल रहा है| सोचो वो कैसे इन 6 महीने से जी रहा होगा? कितने लोगो ने भुखमरी के कारण अपनी जान गवाई? कितने लोग सड़क पर आ गये कितने लोगो के बिज़नेस ठप हो गये?
मीडिया जुड़ा होता है पूरे समाज से| क्या मीडिया की ये जिम्मेदारी नही कि वो इन समस्याओं के मुद्दे उठाये| लोगो को अभिव्यक्ति की आज़ादी का हक़ दिया गया है इस कारण मीडिया को भी ये आज़ादी दी गयी कि वह सभी मुद्दे उठाये पर क्या सच में मीडिया ऐसा कर रही है?

और पढ़े: बेरोज़गारी (घटती वैकेंसी, परेशान युवा)

आज की मीडिया को देख के सिर्फ ऐसा लगता है कि इस देश को मीडिया को सिर्फ वो मुद्दा उठाना है जिससे उनके चैनल्स की TRP बढ़े| बाकि देश की जनता और उनकी समस्याएं जाये भाड़ में|
अगर मीडिया ऐसे कवरेज करती है तो सरकार को चाहिए कि वो इस समस्या को सुलझाएं पर इस समय न ही मीडिया और ना ही सरकार गरीबो की परेशानी के बारे में कोई बात करना चाह रही है| तो क्या देश की जनता अपनी जान दे दे? या जो जनता सरकार से उम्मीद लगाये बैठी है कि सरकार उनके लिए कुछ करे वो भी अब सिर्फ पहले इस बात कर इन्तेजार करे कि पहले सुशांत को न्याय मिल जाये और कंगना सबका भांडाफोड़ दे फिर उसके बाद उनकी समस्यायों का समाधान होगा|  

You can share this post!

0 Comments

Leave Comments