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इस देश की इकोनॉमी क्या चंद हथेलियों को भरने के लिए ही जिंदा है ?

आज यह बात अब सच साबित होती नजर आ रही है कि इस देश का सिस्टम एक फ्रॉड सिस्टम था। इस देश की इकॉनमी उस फ्रॉड सिस्टम को जिंदा रखने के लिए ही चल रही थी। इस देश और इस सिस्टम को चलाने वाली राजनीतिक सत्ताओ ने इस देश को सिर्फ लूटा और अब ऐसा कोई विकल्प नही है जिसके जरिए इस देश की इकोनॉमी को वापस पटरी पर लाया जा सके या फिर सिस्टम भी दोबारा चालू किया जा सके। 

अगर मौजूदा सिस्टम वा सत्ता से आपको कोई आशा है या कोई उम्मीद है तो वह अब पूरी नही हो सकती। खासकर देश का वह युवा जो नौकरी की आश में देश की सरकार की ओर टकटकी लगाए देख रहा है। इस देश का युवा आज यह सोच रहा है कि सरकार कही न कही से तो नौकरियों का पिटारा खोल ही देगी। सबसे बड़ा सवाल तो अब यह है कि जब देश की इकोनॉमी सही थी तब भी सरकार ने उन नौकरियों पर भर्ती क्यो नही की जिनका रिकमेन्डेशन इस सिस्टम ने पहले से ही किया था।

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देश मे जितने भी विभाग और मंत्रालय है उसमें भी भर्तियों की कमी नही है।हर मंत्रालय में तमाम पद अभी भी खाली है। यानी को देश के युवाओं को नौकरी देने के लिए सरकार कोई जदोजहज नही करनी है कोई नए पद खली नही करने है। अगर सरकार चाहे तो उन्ही खाली पड़े लाखो पदों पर भर्तियां कर सकती है। 

लेकिन सरकार सिर्फ इसलिए ऐसा नही कर रही ही क्योकि शायद सरकार यह सोच रही है कि अगर ये सिस्टम लोगो से जुड़ कर काम करेगा तो क्या ये सिस्टम कहि लोगो के हित मे तो नही काम करने लगेंगे। और ऐसा करने पर सरकार के सत्ता धारियों का काफी नुकसान भी हो जाएगा। सिर्फ इतना ही नही देश वा राज्यो में आने वाली हर सरकार अपने करीबियों की नियुक्ति इन खाली पदों पर करती रहेगी जिससे उनका राजनीतिक वजूद बना रहेगा।और यह बात सिर्फ दिखावे के लिए रहेगी कि राज्य वा केंद्र द्वारा यह भर्तियां की गई। हमारा सिस्टम पूरी तरीके से चरमरा चुका है।

युवाओं को यह बात समझनी होगी कि सरकार की सीबीआई, ईडी जिनका नाम लेने से ही विपक्ष, कॉरपोरेट वा मीडिया घराने कांपने लगते है उनमें ही लाखो पद अभी भी खाली पड़े है। सीबीआई के भीतर ही 22 फीसदी पद खाली पड़े है। इतना ही नही ईडी के दफ्तर में भी 64 फीसदी पद खाली पड़े है। यदि हम बात केंद्र सरकार की करे तो केंद्र सरकार के अंदर ही 4 लाख 20 हजार 541 पद खाली पड़े है। इसमें 54 मंत्रालय भी है जिसमे पीएसयु भी है। अगर राज्यो की बात की जाए तो सरकारी आंकड़ों के अनुसार अपर प्राइमरी और प्राइमरी टीचरों में 10 लाख पद खाली पड़े है। इतना ही नही शिक्षकों के लिए 6 हजार पद सेंट्रल यूनिवर्सिटीज में भी खाली पड़े है। 63 हजार पद अन्य राज्यो की यूनिवर्सिटीज में भी खाली पड़े है।

सिर्फ शिक्षकों के पद ही नही बल्कि यूपी पुलिस में ही लगभग डेढ़ लाख पद खाली पड़े है। अगर हम पूरे देश मे पुलिस विभाग की बात करे तो वहाँ करीब 5 लाख 49 हजार पद खाली पड़े है। इतना ही नही देश के इंजीनियरिंग कालेजो में भी करीब 1 लाख पद खाली पड़े है। देश के करीब 56 हजार सरकारी अस्पतालों में भी 2 लाख से ज्यादा पद खाली पड़े है। तो वही स्टेट गवर्नमेंट के इंस्टिट्यूटस में भी करीब 14 लाख पद खाली पड़े है।

ऊपर दिए गए आंकड़ो से यह साफ जाहिर होता है कि इस देश मे छात्र छात्राओं की संख्या लगातार बढ़ी जा रही है लेकिन शिक्षको की भर्तियां क्यो नही की जा रही है यह एक बड़ा सवाल है। देश के तमाम सरकारी शिक्षण संस्थानों में तकरीबन 6 लाख लोग ऐसे है जिनकी नौकरी परमानेंट नही है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि उनकी रोजी रोटी आखिर कैसे चलती होगी। देश के इस सिस्टम में हमारा एडुकेशन सिस्टम पूरी तरह चरमरा उठा है। इस देश के शिक्षकों का जब यह हाल है तो प्रॉफेसनलिज्म का तो और भी बुरा हाल होगा।

अभी तक इस देश के वकीलों, शिक्षकों और पत्रकारो को हमेशा से ही यह लगता रहा है कि कोई भी स्थिति होगी तो हमारा कुछ बिगड़ेगा नही। इन सभी मे हमेशा से ही यह सोचा था कि हमारा रोजगार तो हमेशा चलता रहेगा लेकिन मौजूदा सिस्टम ने इन सब की भी कमर तोड़ दी है। और जिन लोगो को अभी वेतन मिल भी पा रहा है हो सकता है आने वाले दिनों में उनको भी वेतन के लाले पड़ जाए।

वकीलों की तादाद भी इस देश मे काफी तेजी से बढ़ रही है। पिछले पाँच सालो के अनुमानित आंकड़ो की अगर बात की जाए तो अगर सुप्रीम कोर्ट एक साल में एक लाख मामले निपटा देती है तो हर साल उसके पास एक लाख से अधिक नए मामले आ जाते है।ऐसे में वकीलों का हमेशा से ही मानना था कि उनकी रोजी रोटी कभी भी खतरे में नही पड़ सकती लेकिन मौजूदा समय मे न्याय पालिका भी इस सिस्टम का शिकार हो चुकी है। सबऑर्डिनेट कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक हर वर्ष करीब 1 करोड़ केस निपटाए जाते है। सबसे ज्यादा वकीलों की जो हालत खराब हुई है वो यूपी और बिहार में है। इस चरमराए सिस्टम से आज देश का हर वर्ग परेशान है।

इस देश मे मीडिया जगत से जुड़े हुए करीब 15 लाख लोगों के सामने भी आज रोजी रोटी का संकट है। यहाँ तक मीडिया घरानों को अब सरकारी विज्ञापनों का भी पैसा मिल पाना मुश्किल हो रहा है।इस देश मे यह बहुत ही अजीबो गरीब संकट छाया हुआ है। इस देश के सिस्टम को ही इस तरह से सत्ताधारियों ने खड़ा किया कि लोगो की सिर्फ रोजी रोटी चलती रहे और सिर्फ चंद हाथों के लिए ही इकोनॉमी जिंदा रहे।

मौजूदा सिस्टम की बात अगर की जाए तो यह सामने आता है कि देश को दो अलग अलग भागो में अब बाट दिया गया है।जिसमे एक हिस्से में वो 80 करोड़ जनता आती है जिसको सरकार ने इस क्रिसेस मे राशन बाटने के लिए अलग किया दूसरा वो हिस्सा जो मिडल क्लास है और बिना नौकरी के जिनका गुजर बसर नही हो सकता। 

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सरकार ने इस क्रिसेस में सिर्फ उन्हीं लोगों की ओर ध्यान रखा जो हिस्सा वोट बैंक के लिए ज्यादा जरूरी है।और इसकी वजह से जो दूसरा हिस्सा था वो और खाई में गिरता चला गया। ऐसा इसलिए क्योंकि हमारी डेमोक्रेसी उन 80 करोड़ लोगों पर टिकी हुई है जिन्हें सरकार सिर्फ दो जून की रोटी मुहैया कराने का काम कर रही है।

मौजूदा सरकार ने अब जो विजन अपनाया है वो सिर्फ यह है कि अब सरकार सिर्फ उन 80 करोड़ लोगों का ही ध्यान रखेंगी जिन्हें वो दो जून की रोटी के लिए मजबूर कर देगी और सरकार उन्हें दो जून की रोटी देती भी रहेगी। मतलब की सरकार निजीकरण के जरिए उन 20 से 25 करोड़ लोगों को सुविधाएं मुहैया कराएगी जो पैसे वाले है और जो 20 से 25 करोड़ टैक्स पेयर्स बचेंगे उनके टैक्स से 80 करोड़ की रोजी रोटी चलती रहेगी। यही और सरकार देश के लोगो को एक ऐसी परिस्थिति में लाकर खड़ा कर देगी की लोगो की सिर्फ रोजी रोटी चलती रहेगी और इसके अलावा कुछ भी नही।

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